महाराणा प्रताप (जन्म- 9 मई,
1540, राजस्थान, कुम्भलगढ़; मृत्यु- 19 जनवरी,
1597) उदयपुर, मेवाड़ में शिशोदिया राजवंश के
राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-
भूमि पर मेवाड़-मुकुट मणि प्रताप का जन्म हुआ।
उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के
लिये अमर है।
जीवन परिचय
राजस्थान के कुम्भलगढ़ में प्रताप
का जन्म महाराणा उदयसिंह एवं
माता राणी जीवत कँवर के घर हुआ था।
बप्पा रावल के कुल की अक्षुण्ण
कीर्ति की उज्ज्वल पताका, राजपूती आन एवं
शौर्य का वह पुण्य प्रतीक, राणा साँगा का वह
पावन पौत्र जब (वि. सं. 1628 फाल्गुन शुक्ल 15)
तारीख 1 मार्च सन् 1573 को सिंहासनासीन
हुआ। शौर्य की मूर्ति प्रताप एकाकी थे।
अपनी प्रजा के साथ और एकाकी ही उन्होंने
जो धर्म एवं स्वाधीनता के लिये ज्योतिर्मय
बलिदान किया, वह विश्व में सदा परतन्त्रता और
अधर्म के विरुद्ध संग्राम करनेवाले, मानधनी,
गौरवशील मानवों के लिये मशाल सिद्ध होगा।
'धर्म रहेगा और पृथ्वी भी रहेगी, (पर)
मुग़ल-साम्राज्य एक दिन नष्ट हो जायगा।
अत: हे राणा! विश्वम्भर भगवान के भरोसे
अपने निश्चय को अटल रखना।'-अब्दुलरहीम
खानखाना [1]
महाराणा का वह निश्चय लोकविश्रुत है
—भगवान एकलिंग की शपथ है, प्रताप के इस
मुख से अकबर तुर्क ही कहलायेगा। मैं शरीर
रहते उसकी अधीनता स्वीकार करके उसे
बादशाह नहीं कहूँगा। सूर्य जहाँ उगता है,
वहाँ पूर्व में ही उगेगा। सूर्य के पश्चिम में
उगने के समान प्रताप के मुख से अकबर
को बादशाह निकलना असम्भव है|
सम्राट अकबर की कूटनीति व्यापक थी,
राज्य को जिस प्रकार उन्होंने राजपूत-
नरेशों से सन्धि एवं वैवाहिक सम्बन्ध
द्वारा निर्भय एवं विस्तृत कर लिया था,
धर्म के सम्बन्ध में भी वे अपने 'दीन इलाही'
के द्वारा हिन्दू-धर्म की श्रद्धा थकित
करने के प्रयास में नहीं थे- कहना कठिन है।
आज कोई कुछ कहे, किंतु उस युग में
सच्ची राष्ट्रियता थी हिंदुत्व, और
उसकी उज्ज्वल ध्वजा गर्व पूर्वक उठाने
वाला एक ही अमर सेनानी था- प्रताप।
अकबर का शक्ति सागर इस अरावली के
शिखर से व्यर्थ ही टकराता रहा-
नहीं झुका।
अकबर के महासेनापति मानसिंह शोलापुर
विजय करके लौट रहे थे। उदय सागर पर
महाराणा ने उनके स्वागत का प्रबन्ध
किया। हिन्दू नरेश के यहाँ,
भला अतिथि का सत्कार न होता, किंतु
महाराणा प्रताप ऐसे राजपूत के साथ
बैठकर भोजन कैसे कर सकते थे, जिसकी बुआ
मुग़ल-अन्त:पुर में हो। मानसिंह को बात
समझने में कठिनाई नहीं हुई। अपमान से जले
वे दिल्ली पहुँचे। उन्होंने सैन्य सज्जित करके
चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।
वीरता के परिचायक
महाराणा प्रताप ने एक प्रतिष्ठित कुल के मान
—सम्मान और उसकी उपाधि को प्राप्त किया।
परन्तु उसके पास न तो राजधानी थी और न
ही वित्तीय साधन। बार—बार की पराजयों ने
उसके स्वबन्धुओं और जाति के
लोगों को निरुत्साहित कर दिया था। फिर
भी उसके पास अपना जातीय स्वाभिमान था।
उसने सत्तारूढ़ होते ही चित्तौड़ के उद्धार, कुल के
सम्मान की पुनर्स्थापना तथा उसकी शक्ति को
प्रतिष्ठित करने की तरफ़ अपना ध्यान केन्द्रित
किया। इस ध्येय से प्रेरित होकर वह अपने प्रबल
शत्रु के विरुद्ध जुट सका। उसने इस बात
की चिन्ता नहीं की कि परिस्थितियाँ उसके
कितने प्रतिकूल हैं। उसका चतुर विरोधी एक
सुनिश्चित नीति के द्वारा उसके ध्येय
का परास्त करने में लगा हुआ था। धूर्त्त मुग़ल
प्रताप के धर्म और रक्त बंधुओं को ही उसके विरोध
में खड़ा करने में जुटा था।
मारवाड़, आमेर, बीकानेर और बूँदी के राजा लोग
अकबर की सार्वभौम सत्ता के सामने मस्तक
झुका चुके थे। इतना ही नहीं, प्रताप
का सगा भाई सागर भी उसका साथ छोड़कर
शत्रु—पक्ष से जा मिला और अपने इस
विश्वासघात की क़ीमत उसे अपने कुल
की राजधानी और उपाधि के रूप में प्राप्त हुई।
बलिदान भूमि हल्दीघाटी
मुख्य लेख : हल्दीघाटी
राजपूताने की वह पावन बलिदान-भूमि, विश्व में
इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं। इतिहास
के पृष्ठ रंगे हैं उस शौर्य एवं तेज़ की भव्य गाथा से।
भीलों का अपने देश और नरेश के लिये वह अमर
बलिदान, राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और
महाराणा का वह लोकोत्तर पराक्रम—
इतिहास का, वीरकाव्य का वह परम उपजीव्य है।
मेवाड़ के उष्ण रक्त ने श्रावण संवत 1633 वि0
में हल्दीघाटी का कण-कण लाल कर दिया।
अपार शत्रु सेना के सम्मुख थोड़े–से राजपूत और
भील सैनिक कब तक टिकते? महाराणा को पीछे
हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक-उसने उन्हें
निरापद पहुँचाने में इतना श्रम किया कि अन्त में
वह सदा के लिये अपने स्वामी के चरणों में गिर
पड़ा।
दिल्ली का उत्तराधिकारी, युवराज सलीम
मुग़ल सेना के युद्ध के लिए चढ़ आया। उसके साथ
राजा मानसिंह और सागरजी का जातिभ्रष्ट
पुत्र मोहबत ख़ाँ भी था। प्रताप ने अपने
पर्वतों और बाईस हज़ार राजपूतों में विश्वास
रखते हुए अकबर के पुत्र का सामना किया।
अरावली के पश्चिम छोर तक
शाही सेना को किसी प्रकार के विरोध
का सामना नहीं करना पड़ा। परन्तु इसके आगे
का मार्ग प्रताप के नियन्त्रण में था।
प्रताप अपनी नई राजधानी के पश्चिम की ओर
पहाड़ियों में आ डटा। इस इलाक़े की लम्बाई
लगभग अस्सी मील थी और इतनी ही चौड़ाई
थी। सारा इलाक़ा पर्वतों और वनों से घिरा हुआ
है। बीच—बीच में कई छोटी—
छोटी नदियाँ बहती हैं। राजधानी की तरफ़
जाने वाले मार्ग इतने तंग और दुर्गम हैं
कि बड़ी कठिनाई से दो गाड़ियाँ आ—
जा सकती हैं। उस स्थान का नाम हल्दीघाटी है।
जिसके द्वार पर खड़े पर्वत को लाँघकर उसमें प्रवेश
करना संकट को मोल लेना है। उनके साथ
विश्वासी भील लोग भी धनुष और बांण लेकर डट
गए। भीलों के पास बड़े—बड़े पत्थरों के ढेर पड़े थे।
जैसे ही शत्रु सामने से आयेगा वैसे
ही पत्थरों को लुढ़काकर उनके सिर को तोड़ने
की योजना थी।
हल्दीघाटी के इस प्रवेश द्वार पर अपने चुने हुए
सैनिकों के साथ प्रताप शत्रु की प्रतीक्षा करने
लगा। दोनों ओर की सेनाओं का सामना होते
ही भीषण रूप से युद्ध शुरू हो गया और दोनों तरफ़
के शूरवीर योद्धा घायल होकर ज़मीन पर गिरने
लगे। प्रताप अपने घोड़े पर सवार होकर द्रुतगति से
शत्रु की सेना के भीतर पहुँच गया और राजपूतों के
शत्रु मानसिंह को खोजने लगा। वह
तो नहीं मिला परन्तु प्रताप उस जगह पर पहुँच
गया जहाँ पर सलीम अपने हाथी पर बैठा हुआ था।
प्रताप की तलवार से सलीम के कई अंगरक्षक मारे
गए और यदि प्रताप के भाले और सलीम के बीच में
लोहे की मोटी चादर
वाला हौदा नहीं होता तो अकबर अपने
उत्तराधिकारी से हाथ धो बैठता। प्रताप के
घोड़े चेतक ने अपने स्वामी की इच्छा को भाँपकर
पूरा प्रयास किया और तमाम ऐतिहासिक
चित्रों में सलीम के हाथी के सूँड़ पर चेतक का एक
उठा हुआ पैर और प्रताप के भाले द्वारा महावत
का छाती का छलनी होना अंकित
किया गया है। महावत के मारे जाने पर घायल
हाथी सलीम सहित युद्ध भूमि से भाग खड़ा हुआ।
इस समय युद्ध अत्यन्त भयानक हो उठा था। सलीम
पर प्रताप के आक्रमण को देखकर असंख्य मुग़ल
सैनिक उसी तरफ़ बढ़े और प्रताप को घेरकर
चारों तरफ़ से प्रहार करने लगे। प्रताप के सिर पर
मेवाड़ का राजमुकुट लगा हुआ था। इसलिए मुग़ल
सैनिक उसी को निशाना बनाकर वार कर रहे थे।
राजपूत सैनिक भी उसे बचाने के लिए प्राण
हथेली पर रखकर संघर्ष कर रहे थे। परन्तु धीरे—धीरे
प्रताप संकट में फँसता जा रहा था।
स्थिति की गम्भीरता को परखकर
झाला सरदार ने स्वामिभक्ति का एक अपूर्व
आदर्श प्रस्तुत करते हुए अपने प्राणों का बलिदान
कर दिया। झाला सरदार मन्नाजी तेज़ी के आगे
बढ़ा और प्रताप के सिर से मुकुट उतार कर अपने
सिर पर रख लिया और तेज़ी के साथ कुछ दूरी पर
जाकर घमासान युद्ध करने लगा। मुग़ल सैनिक उसे
ही प्रताप समझकर उस पर टूट पड़े और प्रताप
को युद्ध भूमि से दूर निकल जाने का अवसर मिल
गया। उसका सारा शरीर अगणित घावों से
लहूलुहान हो चुका था। युद्धभूमि से जाते—जाते
प्रताप ने मन्नाजी को मरते देखा। राजपूतों ने
बहादुरी के साथ मुग़लों का मुक़ाबला किया,
परन्तु मैदानी तोपों तथा बन्दूकधारियों से
सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने
समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर
उपस्थित बाईस हज़ार राजपूत सैनिकों में से केवल
आठ हज़ार जिवित सैनिक युद्धभूमि से
किसी प्रकार बचकर निकल पाये।
व्यक्तित्व
महाराणा का वनवास
महाराणा चित्तौड़ छोड़कर वनवासी हुए।
महाराणी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास
की रोटियों और निर्झर के जल पर किसी प्रकार
जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए।
अरावली की गुफ़ाएँ ही आवास थीं और
शिला ही शैया थी। दिल्ली का सम्राट सादर
सेनापतित्व देने को प्रस्तुत था, उससे भी अधिक-
वह केवल चाहता था प्रताप अधीनता स्वीकार
कर लें, उसका दम्भ सफल हो जाय। हिंदुत्व पर
दीन-इलाही स्वयं विजयी हो जाता। प्रताप-
राजपूत की आन का वह सम्राट, हिंदुत्व का वह
गौरव-सूर्य इस संकट, त्याग, तप में अम्लान रहा-
अडिंग रहा। धर्म के लिये, आन के लिये यह
तपस्या अकल्पित है । कहते हैं महाराणा ने अकबर
को एक बार सन्धि-पत्र भेजा था, पर
इतिहासकार इसे सत्य नहीं मानते। यह अबुल फजल
की गढ़ी हुई कहानी भर है। अकल्पित
सहायता मिली, मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने
महाराणा के चरणों में अपनी समस्त सम्पत्ति रख
दी। महाराणा इस प्रचुर सम्पत्ति से पुन: सैन्य-
संगठन में लग गये। चित्तौड़ को छोड़कर
महाराणा ने अपने समस्त दुर्गों का शत्रु से उद्वार
कर लिया। उदयपुर उनकी राजधानी बना। अपने
24 वर्षों के शासन काल में उन्होंने मेवाड़
की केशरिया पताका सदा ऊँची रक्खी।
महाराणा की प्रतिज्ञा
प्रताप को अभूतपूर्व समर्थन मिला। यद्यपि धन
और उज्ज्वल भविष्य ने उसके
सरदारों को काफ़ी प्रलोभन दिया, परन्तु
किसी ने भी उसका साथ नहीं छोड़ा। जयमल के
पुत्रों ने उसके कार्य के लिये अपना रक्त बहाया,
पत्ता के वंशधरों ने भी ऐसा ही किया और
सलूम्बर के कुल वालों ने
भी चूण्डा की स्वामिभक्ति को जीवित रखा।
इनकी वीरता और स्वार्थ—त्याग का वृत्तान्त
मेवाड़ के इतिहास में अत्यन्त गौरवमय
समझा जाता है। उसने प्रतीज्ञा की थी कि वह
'माता के पवित्र दूध को कभी कलंकित
नहीं करेगा।' इस प्रतिज्ञा का पालन उसने
पूरी तरह से किया। कभी मैदानी प्रदेशों पर
धावा मारकर जन—
स्थानों को उजाड़ना तो कभी एक पर्वत से दूसरे
पर्वत पर भागना और इस विपत्ति काल में अपने
परिवार का पर्वतीय कन्दमूल फल द्वारा भरण-
पोषण करना और अपने पुत्र अमर
का जंगली जानवरों और जंगली लोगों के मध्य
पालन करना-अत्यन्त कष्टप्राय कार्य था। इन
सबके पीछे मूल मंत्र यही था कि बप्पा रावल
का वंशज किसी शत्रु अथवा देशद्रोही के सम्मुख
शीश झुकाये - यह असम्भव बात थी। क़ायरों के
योग्य इस पापमय विचार से ही प्रताप का हृदय
टुकड़े-टुकड़े हो जाता था। तातार
वालों को अपनी बहन-बेटी समर्पण कर अनुग्रह
प्राप्त करना, प्रताप को किसी भी दशा में
स्वीकार्य न था। 'चित्तौड़ के उद्धार से पूर्व
पात्र में भोजन, शय्यापर शयन दोनों मेरे लिये
वर्जित रहेंगे।' महाराणा की प्रतिज्ञा अक्षुण्ण
रही और जब वे (वि0 सं0 1653 माघ शुक्ल 11)
ता0 29 जनवरी सन् 1597 में परमधाम
की यात्रा करने लगे, उनके परिजनों और
सामन्तों ने वही प्रतिज्ञा करके उन्हें आश्वस्त
किया। अरावली के कण-कण में
महाराणा का जीवन-चरित्र अंकित है।
शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और
उत्पीड़ितों के लिये वह प्रकाश का काम देगा।
चित्तौड़ की उस पवित्र भूमि में युगों तक मानव
स्वराज्य एवं स्वधर्म का अमर सन्देश झंकृत
होता रहेगा।
माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप।अकबर
सूतो ओधकै, जाण सिराणै साप॥
कठोर जीवन निर्वाह
चित्तौड़ के विध्वंस और उसकी दीन
दशा को देखकर भट्ट कवियों ने उसको 'आभूषण
रहित विधवा स्त्री- की उपमा दी है। प्रताप ने
अपनी जन्मभूमि की इस दशा को देखकर सब
प्रकार के भोग—विलास को त्याग दिया,
भोजन—पान के समय काम में लिये जाने वाले
सोने-चाँदी के बर्तनों को त्यागकर वृक्षों के
पत्तों को काम में लिया जाने लगा, कोमल
शय्या को छोड़ तृण शय्या का उपयोग
किया जाने लगा। उसने अकेले ही इस कठिन मार्ग
को नहीं अपनाया अपितु अपने वंश वालों के लिये
भी इस कठोर नियम का पालन करने के लिये
आज्ञा दी थी कि जब तक चित्तौड़ का उद्धार
न हो तब तक सिसोदिया राजपूतों को सभी सुख
त्याग देने चाहिएँ। चित्तौड़
की मौजूदा दुर्दशा सभी लोगों के हृदय में अंकित
हो जाय, इस दृष्टि से उसने यह आदेश
भी दिया कि युद्ध के लिये प्रस्थान करते समय
जो नगाड़े सेना के आगे—आगे बजाये जाते थे, वे अब
सेना के पीछे बजाये जायें। इस आदेश का पालन
आज तक किया जा रहा है और युद्ध के नगाड़े
सेना के पिछले भाग के साथ ही चलते हैं।
राणा साँगा नेता के रूप में
प्रताप को प्रायः यह कहते सुना गया कि,
"यदि उदयसिंह पैदा न होते अथवा संग्रामसिंह
और उनके बीच में कोई सिसोदिया कुल में उत्पन्न
न होता तो कोई भी तुर्क राजस्थान पर
अपना नियम लागू न कर पाता।" सौ वर्ष के बीच
में हिन्दू जाति का एक नया चित्र दिखलाई
देता है। गंगा और यमुना का मध्यवर्ती देश अपने
विध्वंस को भुलाकर एक नवीन बल से बलवान
होकर धीरे—धीरे अपना मस्तक उठा रहा था।
आमेर और मारवाड़ इतने बलवान हो गये थे
कि अकेले मारवाड़ ने ही सम्राट शेरशाह के
विरुद्ध संघर्ष किया था और चम्बल के
दोनों किनारों पर अनेक छोटे—छोटे राज्य बल
संग्रह करके उन्नति की ओर बढ़ रहे थे।
कमी थी तो केवल एक ऐसे नेता की जो उन सब
शक्तियों को संगठित करके
मुसलमानों की सत्ता को छीन सके।
ऐसा नेता उन्हें राणा साँगा के रूप में मिला था।
हिमालय से लेकर रामेश्वर तक सब ने ही साँगा के
गुणों की प्रशंसा की थी। साँगा के स्वर्ग
सिधारने के पश्चात जातीय जीवन धीरे—धीरे
नष्ट होता गया और हिन्दू लोग अपने पैतृक राज्य
से हाथ धो बैठे। यदि साँगा के पीछे उदयसिंह
का जन्म न होता अथवा अकबर की अपेक्षा कम
समर्थ वाले मुसलमान के हाथ में भारत का शासन
होता तो भारत की ऐसी दुर्दशा कभी न होती।
महाराणा द्वारा तैयार ढाँचा
अपने कुछ अनुभवी और बुद्धिमान
सरदारों की सहायता से प्रताप ने सीमित
साधनों और समय की आवश्यकता को समझते हुए
अपनी सरकार का नया ढाँचा निर्मित किया।
आवश्यक सैनिक सेवा की स्पष्ट व्याख्या के साथ
नई-नई जागीरें प्रदान की गई। सरकार के
मौजूदा केन्द्र कमलमीर की सुरक्षा को मज़बूत
बनाया गया तथा गोगुन्दा और अन्य पर्वतीय
दुर्गों की मरम्मत की गई। मेवाड़ के समतल मैदान
की रक्षा करने में असमर्थ प्रताप ने अपने
पूर्वजों की नीति का अनुसरण करते हुए दुर्गम
पहाड़ी स्थानों में अपने मोर्चे क़ायम किए
तथा मैदानी क्षेत्रों के लोगों को परिवार
सहित पर्वतों में आश्रय लेने को कहा गया। ऐसा न
करने वालों को प्राणदण्ड देने
की घोषणा की गई। कुछ ही दिनों में बनास और
बेड़स नदियों के सिंचित क्षेत्र भी सूने हो गये
अर्थात् "बे-चिराग़" हो गए। प्रताप ने
अपनी प्रजा को कठोरता के साथ अपने
आदेशों का पालन करने के लिए विवश कर
दिया था। उसकी आज्ञा के फलस्वरूप मेवाड़
की सुन्दर भूमि श्मशान के समान हो गई और उस
पर यवनों के दाँत पड़ने की कोई आशंका न रही।
उस समय यूरोप के साथ मुग़लों का व्यापार-
वाणिज्य मेवाड़ के भीतर
होकर सूरत या किसी और बन्दरगाह से होता था।
प्रताप तथा उसके सरदार अवसर पाकर उस समस्त
सामग्री को लूटने लगे।
मारवाड़ का राज्य
अजमेर को अपना केन्द्र बनाकर अकबर ने प्रताप
के विरुद्ध सैनिक अभियान शुरू कर दिया।
मारवाड़ का मालदेव जिसने शेरशाह का प्रबल
विरोध किया था, मेड़ताऔर जोधपुर में असफल
प्रतिरोध के बाद, आमेर के भगवान दास के समान
ही अकबर की शरण में चला गया।[5] उसने अपने
पुत्र उदयसिंह को अकबर की सेवा में भेजा। अकबर
ने अजमेर की तरफ़ जाते हुए नागौर में उससे
मुलाक़ात की और इस अवसर पर मंडौर के राव
को "राजा" की उपाधि प्रदान की।
[6]उसका उत्तराधिकारी उदयसिंह स्थूल शरीर
का था, अतः आगे चलकर वह राजस्थान के
इतिहास में 'मोटा राजा' के नाम से विख्यात
हुआ। इस समय से कन्नौज के वंशज मुग़ल बादशाह के
'दाहिने हाथ' पर स्थान पाने लगे। परन्तु अपनी कुल
मर्यादा की बलि देकर मारवाड़ नरेश ने जिस
सम्मान को प्राप्त किया था, वह सम्मान
क्या मारवाड़ के राज के सन्तान की ऊँचे सम्मान
की बराबरी कर सकता है।
मोटा राजा उदयसिंह पहला व्यक्ति था जिसने
अपनी कुल की पहली कन्या का विवाह तातार
से किया था। इस सम्बन्ध के लिए जो घूस ली गई
वह महत्त्वपूर्ण थी। उसे चार समृद्ध परगने प्राप्त
हुए। इनकी सालान आमदनी बीस लाख रुपये थी।
इन परगनों के प्राप्त हो जाने से मारवाड़ राज्य
की आय दुगुनी हो गई। आमेर और मारवाड़ जैसे
उदाहरणों की मौजूदगी में, और प्रलोभन
का विरोध करने की शक्ति की कमी के कारण,
राजस्थान के छोटे राजा लोग अपने असंख्य
पराक्रमी सरदारों के साथ दिल्ली के सामंतों में
परिवर्तित हो गए और इस परिवर्तन के कारण उनमें
से बहुत से लोगों का महत्त्व भी बढ़ गया। मुग़ल
इतिहासकारों ने सत्य ही लिखा है कि वे
'सिंहासन के स्तम्भ और अलंकार के स्वरूप थे।' परन्तु
उपर्युक्त सभी बातें प्रताप के विरुद्ध भयजनक थीं।
उसके देशवासियों के शस्त्र अब उसी के विरुद्ध उठ
रहे थे। अपनी मान-मर्यादा बेचने वाले राजाओं से
यह बात सही नहीं जा रही थी कि प्रताप गौरव
के ऊँचे आसमान पर विराजमान रहे। इस बात
का विचार करके ही उनके हृदय में डाह की प्रबल
आग जलने लगी। प्रताप ने उन समस्त राजाओं
(बूँदी के अलावा) से अपना सम्बन्ध छोड़
दिया जो मुसलमानों से मिल गए थे।
सीसोदिया वंश
सीसोदिया वंश के किसी शासक ने
अपनी कन्या मुग़लों को नहीं दी। इतना हि नहीं,
उन्होंने लम्बे समय तक उन
राजवंशों को भी अपनी कन्याएँ
नहीं दीं जिन्होंने मुग़लों के साथ वैवाहिक
सम्बन्ध किये थे। इससे उन राजाओं
को काफ़ी आघात पहुँचा। इसकी पुष्टि मारवाड़
और आमेर के राजाओं - बख़्त सिंह और जयसिंह के
पुत्रों से होती है। दोनों ही शासकों ने मेवाड़ के
सिसोदिया वंश के साथ वैवाहिक
सम्बन्धों को पुनः स्थापित करने का अनुरोध
किया था। लगभग एक शताब्दी के बाद
उनका अनुरोध स्वीकार किया गया और वह
भी इस शर्त के साथ कि मेवाड़ की राजकन्या के
गर्भ से उत्पन्न होने वाला पुत्र ही सम्बन्धित
राजा का उत्तराधिकारी होगा।
सीसोदिया घराने ने अपने की रक्त
की पवित्रता को बनाये रखने के लिए जो क़दम
उठाये उनमें से एक का उल्लेख करना आवश्यक है
क्योंकि उस घटना ने आने वाली घटनाओं
को काफ़ी प्रभावित किया है। आमेर
का राजा मानसिंह अपने वंश का अत्यधिक
प्रसिद्ध राजा था और उसके समय से ही उसके
राज्य की उन्नति आरम्भ हुई थी। अकबर
उसका फूफ़ा था। वैसे मानसिंह एक साहसी, चतुर
और रणविशारद् सेनानायक था और अकबर
की सफलताओं में आधा योगदान भी रहा था,
परन्तु पारिवारिक सम्बन्ध तथा अकबर
की विशेष कृपा से वह मुग़ल
साम्राज्य का महत्त्वपूर्ण सेनापित बन गया था।
कच्छवाह भट्टकवियों ने उसके शौर्य
तथा उसकी उपलब्धियों का तेजस्विनी भाषा में
उल्लेख किया है।
राणा प्रताप से मानसिंह का मिलाप
शोलापुर की विजय के बाद मानसिंह वापस
हिन्दुस्तान लौट रहा था तो उसने राणा प्रताप
से जो इन दिनों कमलमीर में था, मिलने
की इच्छा प्रकट की। प्रताप उसका स्वागत करने
के लिए उदयसागर तक आया। इस झील के सामने
वाले टीले पर आमेर के राजा के लिए दावत
की व्यवस्था की गई। भोजन तैयार हो जाने पर
मानसिंह को बुलावा भेजा गया। राजकुमार
अमर सिंह को अतिथि की सेवा के लिए नियुक्त
किया गया था। राणा प्रताप अनुपस्थित थे।
मानसिंह के पूछने पर अमरसिंह ने
बताया कि राणा को सिरदर्द है, वे नहीं आ
पायेंगे। आप भोजन करके विश्राम करें। मानसिंह
ने गर्व के साथ सम्मानित स्वर में कहा कि,
"राणा जी से कहो कि उनके सिर दर्द
का यथार्थ कारण समझ गया हूँ। जो कुछ
होना था, वह तो हो गया और उसको सुधारने
का कोई उपाय नहीं है, फिर भी यदि वे मुझे
खाना नहीं परोसगें तो और कौन परोसेगा।"
मानसिंह ने राणा के बिना भोजन स्वीकार
नहीं किया तब प्रताप ने उसे
कहला भेजा कि जिस राजपूत ने अपनी बहन तुर्क
को दी हो, उसके साथ कौन राजपूत भोजन
करेगा।
राजा मानसिंह ने इस अपमान को आहूत करने में
बुद्धिमता नहीं दिखाई थी। यदि प्रताप
की तरफ़ से उसे नियंत्रित किया गया होता तब
तो उसका विचार उचित माना जा सकता था,
परन्तु इसके लिए प्रताप
को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मानसिंह ने
भोजन को छुआ तक नहीं, केवल चावल के कुछ
कणों को जो अन्न देवता को अर्पण किए थे, उन्हें
अपनी पगड़ी में रखकर वहाँ से चला गया। जाते
समय उसने कहा, 'आपकी ही मान-मर्यादा बचाने
के लिए हमने अपनी मर्यादा को खोकर
मुग़लों को अपनी बहिन-बेटियाँ दीं। इस पर
भी जब आप में और हम में विषमता रही,
तो आपकी स्थिति में भी कमी आयेगी।
यदि आपकी इच्छा सदा ही विपत्ति में रहने
की है, तो यह अभिप्राय शीघ्र ही पूरा होगा।
यह देश हृदय से आपकों धारण नहीं करेगा।' अपने
घोड़े पर सवार होकर मानसिंह ने राणा प्रताप,
जो इस समय आ पहुँचे थे, को कठोर दृष्टि से
निहारते हुए कहा, 'यदि मैं तुम्हारा यह मान चूर्ण
न कर दूँ तो मेरा नाम मानसिंह नहीं।'
प्रताप ने उत्तर दिया कि आपसे मिलकर मुझे
खुशी होगी। वहाँ पर उपस्थित किसी व्यक्ति ने
अभद्र भाषा में कह दिया कि अपने साथ
फूफ़ा को लाना मत भूलना। जिस स्थान पर
मानसिंह के लिए भोजन सजाया गया था उसे
अपवित्र हुआ मानकर खोद दिया गया और फिर
वहाँ गंगा जल छिड़का गया और जिन
सरदारों एवं राजपूतों ने अपमान का यह दृश्य
देखा था, उन सभी ने अपने को मानसिंह
का दर्शन करने से पतित समझकर स्नान
किया तथा वस्त्रादि बदले।[8]मुग़ल सम्राट
को सम्पूर्ण वृत्तान्त की सूचना दी गई। उसने
मानसिंह के अपमान को अपना अपमान समझा।
अकबर ने समझा था कि राजपूत अपने पुराने
संस्कारों को छोड़ बैठे होंगे, परन्तु यह उसकी भूल
थी। इस अपमान का बदला लेने के लिए युद्ध
की तैयारी की गई और इन युद्धों ने प्रताप
का नाम अमर कर दिया।
पहला युद्ध हल्दीघाटी के नाम से प्रसिद्ध है। जब
तक मेवाड़ पर किसी सीसोदिया का अधिकार
रहेगा अथवा कोई भट्टकवि जीवित रहेगा तब तक
हल्दीघाटी का नाम कोई भुला नहीं सकेगा।
पराक्रमी चेतक
महाराणा प्रताप के पास एक सबसे प्रिय
घोड़ा था। जिसका नाम चेतक था।
हल्दी घाटी के युद्ध में बिना किसी सहायक के
प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो पहाड़
की ओर चल पड़ा। उसके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे
हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को बचा लिया। रास्ते
में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। घायल चेतक
फुर्ती से उसे लाँघ गया परन्तु मुग़ल उसे पार न कर
पाये। चेतक, नाला तो लाँघ गया पर अब
उसकी गति धीरे—धीरे कम होती गई और पीछे से
मुग़लों के घोड़ों की टापें भी सुनाई पड़ीं।
उसी समय प्रताप को अपनी मातृभाषा में
आवाज़ सुनाई पड़ी, "हो,
नीला घोड़ा रा असवार।" प्रताप ने पीछे मुड़कर
देखा तो उसे एक ही अश्वारोही दिखाई
पड़ा और वह था, उसका भाई शक्तिसिंह। प्रताप
के साथ व्यक्तिगत विरोध ने उसे
देशद्रोही बनाकर अकबर का सेवक
बना दिया था और युद्धस्थल पर वह मुग़ल पक्ष
की तरफ़ से लड़ रहा था। जब उसने नीले घोड़े
को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ़ जाते
हुए देखा तो वह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा,
परन्तु केवल दोनों मुग़लों को यमलोक पहुँचाने के
लिए।
शक्तिसिंह द्वारा प्रताप की सुरक्षा
जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले
मिले। इस बीच चेतक ज़मीन पर गिर पड़ा और जब
प्रताप उसकी काठी को खोलकर अपने भाई
द्वारा प्रस्तुत घोड़े पर रख रहा था, चेतक ने प्राण
त्याग दिए। बाद में उस स्थान पर एक
चबूतरा खड़ा किया गया जो आज तक उस स्थान
को इंगित करता है, जहाँ पर चेतक मरा था।
प्रताप को विदा करके शक्तिसिंह
खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार होकर वापस
लौट आया। सलीम को उस पर कुछ सन्देह पैदा हुआ
जब शक्तिसिंह ने कहा कि प्रताप ने न केवल
पीछा करने वाले दोनों मुग़ल सैनिकों को मार
डाला अपितु मेरा घोड़ा भी छीन लिया।
इसलिए मुझे खुरासानी सैनिक के घोड़े पर सवार
होकर आना पड़ा। सलीम ने वचन दिया कि अगर
तुम सत्य बात कह दोगे तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा।
तब शक्तिसिंह ने कहा, 'मेरे भाई के कन्धों पर
मेवाड़ राज्य का बोझा है। इस संकट के समय
उसकी सहायता किए बिना मैं कैसे रह
सकता था।' सलीम ने अपना वचन निभाया परन्तु
शक्तिसिंह को अपनी सेवा से हटा दिया।
राणा प्रताप की सेवा में पहुँचकर उसे अच्छी नज़र
भेंट की जा सके, इस ध्येय से उसने भिनसोर नामक
दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। उदयपुर
पहुँचकर उस दुर्ग कों भेंट में देते हुए शक्तिसिंह ने
प्रताप का अभिवादन किया। प्रताप ने प्रसन्न
होकर वह दुर्ग शक्तिसिंह को पुरस्कार में दे
दिया। यह दुर्ग लम्बे समय तक उसके वंशजों के
अधिकार में बना रहा।[9] संवत् 1632 (जुलाई,
1576) के सावन मास की सप्तमी का दिन मेवाड़
के इतिहास में सदा स्मरणीय रहेगा। उस दिन
मेवाड़ के अच्छे रुधिर ने
हल्दीघाटी को सींचा था। प्रताप के अत्यन्त
निकटवर्ती पाँच सौ कुटुम्बी और सम्बन्धी,
ग्वालियर का भूतपूर्व राजा रामशाह और साढ़े
तीन सौ तोंवर वीरों के साथ रामशाह
का बेटा खाण्डेराव मारा गया। स्वामिभक्त
झाला मन्नाजी अपने डेढ़ सौ सरदारों सहित
मारा गया और मेवाड़ के प्रत्येक घर ने बलिदान
किया।
कमलमीर का युद्ध
विजय से प्रसन्न सलीम पहाड़ियों से लौट
गया क्योंकि वर्षा ऋतु के आगमन से आगे
बढ़ना सम्भव न था। इससे प्रताप को कुछ राहत
मिली। परन्तु कुछ समय बाद शत्रु पुनः चढ़
आया और प्रताप को एक बार पुनः पराजित
होना पड़ा। तब प्रताप ने कमलमीर
को अपना केन्द्र बनाया। मुग़ल
सेनानायकों कोका और शाहबाज ख़ाँ ने इस
स्थान को भी घेर लिया। प्रताप ने जमकर
मुक़ाबला किया और तब तक इस स्थान
को नहीं छोड़ा जब तक पानी के विशाल स्रोत
नोगन के कुँए का पानी विषाक्त नहीं कर
दिया गया। ऐसे घृणित विश्वासघात का श्रेय
आबू के देवड़ा सरदार को जाता है, जो इस समय
अकबर के साथ मिला हुआ था। कमलमीर से प्रताप
चावंड चला गया और सोनगरे सरदार भान ने अपने
मृत्यु तक कमलमीर की रक्षा की।
कमलमीर के पतन के बाद राजा मानसिंह ने
धरमेती और गोगुन्दा के दुर्गों पर
भी अधिकार कर लिया।
इसी अवधि में मोहब्बत ख़ाँ ने उदयपुर पर
अधिकार कर लिया और अमीशाह नामक
एक मुग़ल शाहज़ादा ने चावंड और
अगुणा पानोर के मध्यवर्ती क्षेत्र में पड़ाव
डाल कर यहाँ के भीलों से प्रताप
को मिलने वाली सहायता रोक दी।
फ़रीद ख़ाँ नामक एक अन्य मुग़ल
सेनापति ने छप्पन पर आक्रमण किया और
दक्षिण की तरफ़ से चावंड को घेर लिया।
इस प्रकार, प्रताप चारों तरफ़ से शत्रुओं से घिर
गया और बचने की कोई उम्मीद न थी। वह
रोज़ाना एक स्थान से दूसरे स्थान, एक पहाड़ी से
दूसरी पहाड़ी के गुप्त स्थानों में
छिपता रहता और असवर मिलने पर शत्रु पर
आक्रमण करने से भी न चूकता। फ़रीद ने प्रताप
को पकड़ने के लिए चारों तरफ़ अपने
सैनिकों का जाल बिछा दिया परन्तु प्रताप
की छापामार पद्धति ने असंख्य मुग़ल
सैनिकों को मौत के घाट पहुँचा दिया। वर्षा—
ऋतु ने पहाड़ी नदियों और नालों को पानी से
भर दिया जिसकी वजह से आने जाने के मार्ग
अवरुद्ध हो गए। परिणामस्वरूप मुग़लों के आक्रमण
स्थगित हो गए।
परिवार की सुरक्षा
इस प्रकार, समय गुज़रता गया और प्रताप
की कठिनाइयाँ भयंकर बनती गईं। पर्वत के जितने
भी स्थान प्रताप और उसके परिवार को आश्रय
प्रदान कर सकते थे, उन सभी पर बादशाह
का आधिकार हो गया।
राणा को अपनी चिन्ता न थी,
चिन्ता थी तो बस अपने परिवार की ओर से छोटे
—छोटे बच्चों की। वह किसी भी दिन शत्रु के
हाथ में पड़ सकते थे। एक दिन तो उसका परिवार
शत्रुओं के पँन्जे में पहुँच गया था, परन्तु कावा के
स्वामिभक्त भीलों ने उसे बचा लिया। भील
लोग राणा के बच्चों को टोकरों में छिपाकर
जावरा की खानों में ले गये और कई दिनों तक
वहीं पर उनका पालन—पोषण किया। भील लोग
स्वयं भूखे रहकर भी राणा और परिवार के लिए
खाने की सामग्री जुटाते रहते थे। जावरा और
चावंड के घने जंगल के वृक्षों पर लोहे के बड़े—बड़े
कीले अब तक गड़े हुए मिलते हैं। इन कीलों में बेतों के
बड़े—बड़े टोकरे टाँग कर उनमें राणा के
बच्चों को छिपाकर वे भील
राणा की सहायता करते थे। इससे बच्चे पहाड़ों के
जंगली जानवरों से भी सुरक्षित रहते थे। इस
प्रकार की विषम परिस्थिति में भी प्रताप
का विश्वास नहीं डिगा।
अकबर द्वारा प्रशंसा
अकबर ने भी इन समाचारों को सुना और
पता लगाने के लिए अपना एक गुप्तचर भेजा। वह
किसी तरक़ीब से उस स्थान पर पहुँच
गया जहाँ राणा और उसके सरदार एक घने जंगल के
मध्य एक वृक्ष के नीचे घास पर बैठे भोजन कर रहे थे।
खाने में जंगली फल, पत्तियाँ और जड़ें थीं। परन्तु
सभी लोग उस खाने को उसी उत्साह के साथ
खा रहे थे जिस प्रकार कोई राजभवन में बने
भोजन को प्रसन्नता और उमंग के साथ
खाता हो। गुप्तचर ने किसी चेहरे पर उदासी और
चिन्ता नहीं देखी। उसने वापस आकर अकबर
को पूरा वृत्तान्त सुनाया। सुनकर अकबर का हृदय
भी पसीज गया और प्रताप के प्रति उसमें
मानवीय भावना जागृत हुई। उसने अपने दरबार के
अनेक सरदारों से प्रताप के तप, त्याग और
बलिदान की प्रशंसा की। अकबर के
विश्वासपात्र सरदार ख़ानख़ाना ने भी अकबर
के मुख से प्रताप की प्रशंसा सुनी थी। उसने
अपनी भाषा में लिखा, "इस संसार में
सभी नाशवान हैं। राज्य और धन किसी भी समय
नष्ट हो सकता है, परन्तु महान्
व्यक्तियों की ख्याति कभी नष्ट
नहीं हो सकती। पुत्तों ने धन और भूमि को छोड़
दिया, परन्तु उसने कभी अपना सिर
नहीं झुकाया। हिन्द के राजाओं में वही एकमात्र
ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव
को बनाए रखा है।
परन्तु कभी-कभी ऐसे अवसर आ उपस्थित होते, जब
अपने प्राणों से भी प्यारे लोगों को भयानक
आवाज़ से ग्रस्त देखकर वह भयभीत हो उठता।
उसकी पत्नी किसी पहाड़ी या गुफ़ा में
भी असुरक्षित थी और उसके
उत्तराधिकारी जिन्हें हर प्रकार की सुविधाओं
का अधिकार था, भूख से बिलखते उसके पास
आकर रोने लगते। मुग़ल सैनिक इस प्रकार उसके
पीछे पड़ गए थे कि भोजन तैयार होने पर कभी-
कभी खाने का अवसर न मिलता था और
सुरक्षा के लिए भोजन छोड़कर
भागना पड़ता था। एक दिन तो पाँच बार भोजन
पकाया गया और हर बार भोजन को छोड़कर
भागना पड़ा। एक अवसर पर प्रताप की पत्नी और
उसकी पुत्र—वधु ने घास के बीजों को पीसकर कुछ
रोटियाँ बनाई। उनमें से
आधी रोटियाँ बच्चों को दे दी गई और बची हुई
आधी रोटियाँ दूसरे दिन के लिए रख दी गईं।
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