कारगील विजय दिवस

कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) पर विशेष
26 जुलाई का दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में
अंकित एक ऐसा दिन है जिसे समूचा देश कारगिल विजय दिवस के रूप में
मनाता है। इसी दिन आपरेशन विजय का सफलतापूर्वक
समापन हुआ था।


6 मई, 1999 को कारगिल क्षेत्र के अग्रिम मोर्चो पर तैनात
सैनिकों को सूचना मिली कि कुछ दुर्गम
पहाड़ी शिखरों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने
कब्जा कर लिया है। एकाएक जुबार, तोलोलिंग, पाइन्ट 5,140, पाइन्ट
5,203, तीन पिम्पल और टाइगर हिल हर
भारतवासी के लिए जाने-पहचाने नाम बन गए। कारगिल
युद्ध के दौरान यही हिम शिखर भारतीय
सैनिकों के अपूर्व एवम् अतुलनीय वीरता और
बलिदान के साक्षी बन गए।
नियंत्रण रेखा पर स्थित कारगिल क्षेत्र लगभग 168
किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में
नियंत्रण रेखा लगभग शीर्ष शिखरों के साथ-साथ कौबाल
घाटी से काकसर तक और फिर वहां से
संग्रुती से चोरबाटला तक जाती है। 80
किमी का यह क्षेत्र बर्फ से ढंका रहता है और
मारपोल, विम्बट और चोरबाटला को छोड़कर इस क्षेत्र में जवान तैनात
नहीं रहते, विशेषकर सर्दी के दिनों में।
सेना की चौकियों के बीच में
भी काफी दूरियां हैं।
इन्हीं दूरियों का लाभ उठाकर पाकिस्तान
की सेना मुजाहिदीनों के वेश में घुस
आयी और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बर्फ से
ढकी इन चोटियों पर आकर बैठ गयी। इन
घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए सेना ने "आपरेशन विजय' शुरू किया। लेकिन
पाकिस्तानी सेना की नार्दन लाइट
इन्फेन्ट्री के जवानों को बाहर खदड़ेना आसान
नहीं था किन्तु भारतीय सेना ने अपूर्व
वीरता और बलिदान का परिचय दिया। इनमें से कुछ विशेष
अभियान तो भारतीय
सेना की गौरवमयी परम्परा और इतिहास
का स्वर्णिम अध्याय बनकर रह गए।
द्रास के तोलोलिंग क्षेत्र में पाकिस्तान की सेना ने सबसे दूर
तक घुसपैठ की थी और तोलोलिंग
पहाड़ी पर कब्जा करने के बाद वह
आसानी से जम्मू-श्रीनगर-लेह राजमार्ग
को देख सकती थी और
गोलीबारी करके राजमार्ग पर आने-जाने
वाली गाड़ियों पर सीधा निशान साधकर यातायात में
विघ्न डाल सकती थी।
11 जून को 18 ग्रेनेडियर ने तोलोलिंग पर हमला करने के लिए आस-
पास की पहाड़ियों पर कब्जा करके एक सुदृढ़ आधार
बनाना शुरू किया। तोपखाने
की भारी गोलाबारी के
बीच 2 राजपूताना राइफल्स ने 12/13 जून को रात 11
बजकर तीस मिनट पर हमला किया। भारतीय
सेना का यह पहला जवाबी हमला था। इस हमले
की सफलता पर ही आपरेशन विजय
की सफलता निर्भर थी। हमले से कुछ
ही देर पहले 2 राजपूताना राइफल्स के कमांडिंग आफिसर
कर्नल एम.वी. रवीन्द्रनाथ के
फील्ड टेलिफोन पर तत्कालीन थलसेनाध्यक्ष
जनरल वेद प्रकाश मलिक का फोन आया। थल सेनाध्यक्ष ने कर्नल
रवीन्द्र नाथ को कहा "आपको और आपके
जवानों को मुबारकबाद'। राजपूताना राइफल्स के बहादुर जवानों के लिए
अपने सेनाध्यक्ष का व्यक्तिगत संदेश बड़ी से
बड़ी कुर्बानी के लिए प्रेरित करने के लिए
काफी था। जवानों के दिल में जोश और
देशभक्ति का ऐसा संचार हुआ कि वे दुर्गम से दुर्गम पहाड़ियों पर बैठे
शत्रु पर टूट पड़े और 13 जून, 2002 को सुबह 6 बजे तक
तोलोलिंग पर भारतीय सेना ने तिरंगा एक बार फिर फहरा दिया।
इस हमले में 17 सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया और 40
सैनिक घायल हो गए। तोलोलिंग से दुश्मन को बाहर खदेड़ने के बाद
तो सफलता का जो सिलसिला शुरू हुआ वह भारत
की भूमि से शत्रु को बाहर खदड़ेने के बाद
ही समाप्त हुआ।
उधर 26 मई, 1999 को भारतीय वायुसेना ने
थलसेना की सहायता करने के लिए आपरेशन "सफेद
सागर' शुरू किया। इससे पहले
किसी भी वायुसेना को इतने दुर्गम क्षेत्र में
अपना कौशल दिखाने का अवसर नहीं मिला था। 12 जुलाई
तक वायु सेना के विमानों ने 580 उड़ानें भरीं। उधर
हेलीकाप्टर ने 2,500 उड़ानें भरकर घायल
जवानों को युद्ध क्षेत्र से अस्पताल तक लाने का महत्वपूर्ण काम
किया। नौसेना ने भी "आपरेशन तलवार' के अन्र्तगत अपने
युद्धपोत को अरब सागर में तैनात करके पाकिस्तान पर सामरिक दबाव
बनाया।
आपरेशन विजय में अदम्य साहस और अनुकरणीय
वीरता प्रर्शन के लिए 13 जम्मू और
कश्मीर राइफल्स के कैप्टन विक्रम बतरा (मरणोपरान्त)
और राइफलमैन संजय कुमार, 18 ग्रेनेडियर के योगेन्द्र सिंह यादव
और 1/11 गोरखा राइफल्स के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पाण्डेय
(मरणोपरान्त) को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
इनके अलावा 9 वीर अधिकारियों एवं
सैनिकों को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।
★ Salute and Respect ★
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Bravo
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╰☆╮|| Jai Hind - भारत माता की जय || ╰☆╮
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