राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( अंग्रेज़ी : RashtriyaSwayamsevak Sangh या R.S.S.) एक हिंदू
राष्ट्रवादी संघटन है जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व
में निहित और आधारित हैं। यह राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर.एस.एस.
के नाम से अधिक प्रसिद्ध है।
१९२५ में विजयदशमी के दिन डा. केशव हेडगेवार
द्वारा की गयी थी । बीबीसी के अनुसार संघ
विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है। सबसे
पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल
की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर
भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया।
इमर्जेन्सी हटने के बाद जनसंघ का विलय
जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में
मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में
मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-
धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व
बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे
राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ
की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है।
संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में
प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व
में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत
की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।
संघ परिवार की संरचनात्मक व्यवस्था
संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक
का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-
निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक
की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है।
प्रत्येक सरसंघचालक अपने
उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के
वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ
के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के
माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक
स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये
स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान
में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से
ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत:
शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर
आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है।
शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल ,
योग , वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक
पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल
है।
का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-
निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक
की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है।
प्रत्येक सरसंघचालक अपने
उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के
वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ
के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के
माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक
स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये
स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान
में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से
ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत:
शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर
आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है।
शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल ,
योग , वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक
पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल
है।
संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:
केंद्र
क्षेत्र
प्रान्त
विभाग
जिला
तालुका
नगर
मण्डल
शाखा
केंद्र
क्षेत्र
प्रान्त
विभाग
जिला
तालुका
नगर
मण्डल
शाखा
संघ की शाखा
शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे
की लगती है। शाखा में खेल, सूर्य नमस्कार,
समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है।
सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे
की ही लगती है।
शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे
की लगती है। शाखा में खेल, सूर्य नमस्कार,
समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है।
सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे
की ही लगती है।
शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:
प्रभात शाखा: सुबह लगने
वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
सायं शाखा: शाम को लगने
वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
रात्रि शाखा: रात्रि को लगने
वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने
वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने
वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।
पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,०००
शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में
भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता।
कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ"
तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से
चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे
बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक
कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक"
का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व
शारीरिक क्रियाओं के साथ
स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से
आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता है।
संघ वर्ग
ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से
स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं
साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म
की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते
हैं:
वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।
पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,०००
शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में
भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता।
कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ"
तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से
चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे
बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक
कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक"
का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व
शारीरिक क्रियाओं के साथ
स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से
आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता है।
संघ वर्ग
ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से
स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं
साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म
की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते
हैं:
दीपावली वर्ग - ये वर्ग तीन
दिनों का होता है. ये वर्ग तालुका या नगर
स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल
दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन
दिनों का होता है, जो जिला या विभाग
स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल
दिसंबर में आयोजित होता है।
दिनों का होता है. ये वर्ग तालुका या नगर
स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल
दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन
दिनों का होता है, जो जिला या विभाग
स्तर पर आयोजित किया जाता है. ये हर साल
दिसंबर में आयोजित होता है।
निवासी वर्ग - ये वर्ग शाम से सुबह तक
होता है. ये वर्ग हर महीने होता है. ये वर्ग
शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित
होता है।
होता है. ये वर्ग हर महीने होता है. ये वर्ग
शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित
होता है।
संघ शिक्षा वर्ग - प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष,
द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार
के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। "प्राथमिक वर्ग"
एक सप्ताह का होता है, "प्रथम" और "द्वितीय
वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं, जबकि "तृतीय वर्ग"
25 दिनों का होता है। "प्राथमिक वर्ग"
का आयोजन सामान्यतः जिला करता है,
"प्रथम संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन
सामान्यत: प्रान्त करता है, "द्वितीय संघ
शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र
करता है। परन्तु "तृतीय संघ शिक्षा वर्ग" हर
साल नागपुर में ही होता है।
द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार
के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। "प्राथमिक वर्ग"
एक सप्ताह का होता है, "प्रथम" और "द्वितीय
वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं, जबकि "तृतीय वर्ग"
25 दिनों का होता है। "प्राथमिक वर्ग"
का आयोजन सामान्यतः जिला करता है,
"प्रथम संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन
सामान्यत: प्रान्त करता है, "द्वितीय संघ
शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र
करता है। परन्तु "तृतीय संघ शिक्षा वर्ग" हर
साल नागपुर में ही होता है।
बौद्धिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने
या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग
सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित
करता है।
या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग
सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित
करता है।
शारीरिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने
या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग
सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित
करता है।
सामाजिक सुधार में योगदान
हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ
ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में
पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है।
उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू
मूल्यों के हनन का कारण है।
[4]
महात्मा गान्धी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण
अनुशासन देखा और छुआछूत
की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप
से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक
साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।
[5]
राहत और पुनर्वास
राहत और पुर्नवास संघ
कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के
उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश
चक्रवात में रहत कार्यों में
महती भूमिका निभाई है।
[6]
संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से
आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद
लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।
उपलब्धियाँ
संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र
में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन
१९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२
के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल
नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए
कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस
की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण
दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर
तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश
में वहाँ उपस्थित हो गये।
वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने
वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक
पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में
उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत,
प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं
उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण
आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं।
या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग
सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित
करता है।
सामाजिक सुधार में योगदान
हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ
ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में
पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है।
उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू
मूल्यों के हनन का कारण है।
[4]
महात्मा गान्धी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण
अनुशासन देखा और छुआछूत
की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप
से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक
साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।
[5]
राहत और पुनर्वास
राहत और पुर्नवास संघ
कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के
उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश
चक्रवात में रहत कार्यों में
महती भूमिका निभाई है।
[6]
संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से
आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद
लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।
उपलब्धियाँ
संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र
में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन
१९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२
के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल
नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए
कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस
की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण
दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर
तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश
में वहाँ उपस्थित हो गये।
वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने
वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक
पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में
उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत,
प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं
उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण
आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं।
संघ के सरसंघचालक
डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य
डॉक्टरजी ( १९२५ - १९४० )
माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य
गुरूजी ( १९४० - १९७३ )
मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब
देवरस( १९७३ - १९९३ )
प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू
भैया ( १९९३ - २००० )
कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य
सुदर्शनजी ( २००० - २००९ )
डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत (२००९ -)
डॉक्टरजी ( १९२५ - १९४० )
माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य
गुरूजी ( १९४० - १९७३ )
मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब
देवरस( १९७३ - १९९३ )
प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू
भैया ( १९९३ - २००० )
कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य
सुदर्शनजी ( २००० - २००९ )
डॉ. मोहनराव मधुकरराव भागवत (२००९ -)
संघ की प्रार्थना
मुख्य लेख : नमस्ते सदा वत्सले
संघ की प्रार्थना संस्कृत में है।
प्रार्थना की आखरी पंक्ति हिंदी में है.
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र
सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली
हिन्दू स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। संघ
की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस
प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और
ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
।। भारत माता की जय ।।
मुख्य लेख : नमस्ते सदा वत्सले
संघ की प्रार्थना संस्कृत में है।
प्रार्थना की आखरी पंक्ति हिंदी में है.
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र
सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली
हिन्दू स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। संघ
की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस
प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और
ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
।। भारत माता की जय ।।
प्रार्थना का हिन्दी में अर्थ
हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम!
इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और
ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं
बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और
पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह
नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस
भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के
घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ।
आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें
इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें
ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे
कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें
कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने
नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस
कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे
सुगम कर काँटों रहित करेंगे।
ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान
ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र
श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे
अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय
निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में
जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह
विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे
धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर
ले जाने में समर्थ हो।
भारत माता की जय।
हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम!
इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और
ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं
बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और
पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह
नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस
भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के
घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ।
आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें
इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें
ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे
कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें
कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने
नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस
कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे
सुगम कर काँटों रहित करेंगे।
ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान
ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र
श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे
अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय
निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में
जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह
विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे
धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर
ले जाने में समर्थ हो।
भारत माता की जय।
हिन्दी काव्यानुवाद
[7]
हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत
कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन
हजार।।
हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे
मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले
एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के
सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे
कोटिशः नमस्कार।।
तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त
कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ
आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव
हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ
हों सब प्रकार।।
दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह
जग विनम्र;
दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक
पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है
जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक
बार।।
जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर
हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे
प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित
कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में
विचार।।
[7]
हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत
कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन
हजार।।
हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे
मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले
एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के
सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे
कोटिशः नमस्कार।।
तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त
कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ
आशीर्वाद।
सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव
हो पाये;
ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ
हों सब प्रकार।।
दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह
जग विनम्र;
दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक
पथ दुर्निवार।
कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है
जो;
वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक
बार।।
जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर
हो ऐसी;
सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे
प्यार।
निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित
कार्य-शक्ति;
यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में
विचार।।
सहयोगी सँस्थाएँ
सेवा भारती
विद्या-भारती
स्वदेशी जागरण मंच
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
हिंदू स्वयंसेवक संघ
विश्व हिंदू परिषद
भारतीय मजदूर संघ
भारतीय किसान संघ
सेवा भारती
विद्या-भारती
स्वदेशी जागरण मंच
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
हिंदू स्वयंसेवक संघ
विश्व हिंदू परिषद
भारतीय मजदूर संघ
भारतीय किसान संघ
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